मंगलवार 8 सितंबर 2026 - 11:53

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार, उन्नीसवीं सदी का हिंदुस्तान सियासी इंतिशार, फिक्री कश्मकश और इस्तिमार की यलगार का मंज़र पेश कर रहा था। ऐसे पुर-आशोब अहद में लखनऊ की सरज़मीन से एक ऐसी इल्मी व फिक्री शख्सियत उभरी जिसने क़लम को ढाल और फ़िक्र को चराग़ बनाया। ये थे मौलाना अली मुहम्मद बिन मुहम्मद बिन दिलदार अली नक़वी नसीराबादी, जो तारीख़ में ताजुल उलेमा के लक़ब से मशहूर हुए। उन्होंने न सिर्फ़ मज़हबी उलूम में गराँक़दर ख़िदमात अंजाम दीं बल्कि अपने अहद के फिक्री चैलेंजों का मुदल्लल और बावक़ार जवाब भी दिया।

ताजुल औलमा सन 1846 ईस्वी को लखनऊ के एक ऐसे इल्मी ख़ानदान में पैदा हुए जहाँ इल्म व फ़क़ाहत नस्ल दर नस्ल मुन्तक़िल हो रही थी। उनके जद्दे अमजद अल्लामा सैय्यद दिलदार अली नक़वी, अल-मअरूफ़ ग़ुफ़रान-मआब, बर्रे-सगीर के मुमताज़ उलेमा में शुमार होते थे, जबकि ताजुल उलेमा के वालिद सुल्तानुल उलेमा भी अपने वक़्त के जलीलुल-क़द्र आलिम थे। इस ख़ानदानी पस-ए-मंज़र ने ताजुल औलमा की शख्सियत को इब्तिदा ही से इल्मी वक़ार और फिक्री गहराई अता की।

आपने इब्तिदाई तालीम मौलाना मोहम्मद अली अल-मारूफ़ क़ाएमतुद्दीन, मुफ़्ती मुहम्मद अब्बास शूश्तरी और मौलाना अहमद अली मुहम्मदाबादी जैसे बुज़ुर्गों से हासिल की। इसके बाद अपने वालिद से फ़िक़्ह, उसूल और दीगर अक़्ली व नक़्ली उलूम की तकमील की। आप कमसिनी ही में इल्मी पुख़्तगी हासिल कर चुके थे।

लेकिन इल्मी तश्नगी ने उन्हें अतबात-ए-आलियात तक पहुँचा दिया। वह इराक़ के मुक़द्दस शहर कर्बला गए, जहाँ उन्होंने नामवर असातिज़ा से कस्ब-ए-फ़ैज़ किया और मुख़्तसर क़याम के बावजूद इल्मी दुनिया में अपनी सलाहियतों का लोहा मनवाया। ताजुल उलेमा के इल्मी मक़ाम का एतराफ़ करते हुए मशहूर आलिम मिर्ज़ा अली नक़ी तबातबाई ने इजाज़ा-ए-नक़्ल-ए-रिवायत अता किया। इसी तरह कर्बला के दीगर औलमा जैसे ज़ैनुल आबिदीन माज़न्दरानी, सैय्यद अली तबातबाई बहरुल उलूम, राज़ी नजफ़ी, हुसैन फ़ाज़िल अर्दकानी, हसन शहरिस्तानी और सैय्यद मुहम्मद तुर्क ने भी इजाज़ा-ए-नक़्ल-ए-रिवायत अता किए। इसी दौरान हज्जे बैतुल्लाह की ज़ियारत की सआदत भी नसीब हुई, जिसने उनकी रूहानी व फिक्री तरबियत को मज़ीद जिला बख़्शी।

इल्मी मक़ाम के ऐतबार से ताजुल औलमा का शुमार अपने अहद के सफ़-ए-अव्वल के औलमा में होता है। मशहूर मुहक़्क़िक़ आगा बुज़ुर्ग तेहरानी ने इल्म-ए-तफ़्सीर में उनका ज़िक्र अकाबिर मुफस्ससेरीन के साथ किया है। वह फ़िक़्ह, उसूल, कलाम, तफ़्सीर, मन्तिक़ और फ़लसफ़े में यकसाँ महारत रखते थे। उन्होंने शिद्दत-पसंद अख़बारियत पर तनक़ीद की, मगर एतेदाल और तवाज़ुन को हमेशा मुक़द्दम रखा, जिससे उनकी फिक्री बसीरत और इल्मी दयानत वाज़ेह होती है।

आपने तदरीस के मैदान में भी नुमायाँ किरदार अदा किया और बेशुमार शागिर्दों की तरबियत की, जिनमें से बाज़ ख़ुद साहिब-ए-इज्तेहाद बने। उनका हल्क़ा-ए-दर्स महज़ मालूमात की तरसील का मरकज़ न था बल्कि फिक्री तरबियत और एतिदाल-पसंद दीनी शऊर की आबियारी का सरचश्मा भी था।

ताजुल उलेमा के शागिर्दों में मौलाना मुहम्मद हुसैन नौगानवी, मौलाना असग़र हुसैन और मौलाना रज़ा हुसैन के नाम नुमायाँ हैं।

यह वह ज़माना था जब जदीदियत और नैचरियत के अफ़कार हिंदुस्तानी मुआशरे में सरायत कर रहे थे। सर सैय्यद अहमद ख़ान की अक़्ली ताबीरात ने मज़हबी हल्क़ों में बह्स व मुबाहसा को जन्म दिया। ताजुल औमा ने इन नज़रियात का रद्द महज़ जज़्बाती अंदाज़ में नहीं बल्कि इल्मी इस्तदलाल के साथ किया। उन्होंने क़ुरआन व हदीस की रौशनी में ऐसे मुदल्लल जवाबात तहरीर किए जिन्होंने मज़हबी फ़िक्र को मज़बूत बुनियादें फ़राहम कीं।

तस्नीफ़ी मैदान में उनकी ख़िदमात निहायत वसीअ और मुतानव्वे हैं। फ़िक़्ह व उसूल में उनकी मआरक़तुल-आरा तस्नीफ़ इमादुल इज्तेहाद ने इल्मी हल्क़ों में ग़ैर मामूली पज़ीराई हासिल की। इसके अलावा तफ़्सीर, कलाम, अख़लाक़, सियासत और तारीख़ जैसे मौज़ूआत पर भी मुतअद्दिद किताबें तहरीर कीं। अरबी व फ़ारसी के साथ-साथ उर्दू ज़बान में भी उनकी तसानीफ़ ने दीनी अदब को वुसअत अता की।

आपकी तसानीफ़ में तौहफ़तुल वाइज़ीन, दुर्रे बेबहा, शरहे ज़ियारतुन नाहिया, मवाइज़े जवादिया, तफ़्सीर सूरह हल अता, इमादुल इज्तेहाद, तफ़्सीर सूरह यूसुफ़, अहसनुल क़सस, रिसाला महदविया, शरह ए ख़ुत्बा-ए-शक़शिक़िया, तरजुमा दुआ-ए-सबाह, तहक़ीक़ ए सदूक़, नस्रुल मोमिनीन, रद्दे पादरी इमादुद्दीन, क़ुरआन-ए-करीम का उर्दू तरजुमा, नमाज़ के मफ़ाहीम का तरजुमा, अल्फ़िया-ए-शहीद का तरजुमा और वाज़ व अख़लाक़ पर मुताअद्दिद कुतुब वग़ैरह आपके क़लमी आसार में शामिल हैं।

बरतानिया इस्तेमार के दौर में उन्होंने फिक्री व अख़लाक़ी मुज़ाहेमत का रास्ता इख़्तियार किया। उनके नज़दीक मुसलमानों की पसमांदगी का अस्ल सबब इल्मी ज़वाल और दाख़िली इंतिशार था। वह तालीम, इत्तिहाद और फिक्री बेदारी को निजात का रास्ता समझते थे। इसी सोच को  तहत उन्होंने इस्लाह-ए-मुआशरा और तरबियत-ए-नस्ल पर ख़ुसूसी तवज्जोह दी।

लिसानी सतह पर भी उनकी ख़िदमात क़ाबिले-ज़िक्र हैं। मौसूफ़ ने उर्दू ज़बान को फ़रोग़ दिया और वाज़, तरजुमा और तालीफ़ के ज़रिये उर्दू ज़बान को इल्मी इज़हार का मज़बूत वसीला बनाया।

ख़ुदावंद-ए-आलम ने आपको दो साहिबज़ादे अता किए जो  सैय्यद अली अहमद नक़वी और सैय्यद मुहम्मद नक़वी के नाम से पहचाने गए।

अख़लाक़ी व रूहानी एतिबार से भी ताजुल औमा की शख्सियत निहायत मुतावाज़िन और जामे थी। उनके नज़दीक इल्म का मक़सद महज़ मुनाज़रा-आराई नही था बल्कि किरदार-साज़ी और इस्लाह-ए-नफ़्स था। उनकी अख़लाक़ी तसानीफ़ इस बात की गवाही देती हैं कि वह एक मुसलेह, मुरब्बी और रहबर की हैसियत रखते थे।

आख़िरकार यह इल्म व अमल का दरख़्शाँ महताब 4 अक्तूबर 1894 ईस्वी बरोज़ जुमेरात सरज़मीन-ए-लखनऊ पर ख़ामोश हो गया। नमाज़-ए-जनाज़ा के बाद हज़ार आह व बुक़ा के हमराह इमामबाड़ा ग़ुफ़रान-मआब लखनऊ में सुल्तानुल औलमा के पहलू में सुपुर्द-ए-ख़ाक कर दिया गया।

माखूज़ अज़: नुजूमुल हिदाया, तहक़ीक़ो तालीफ़: मौलाना सैयद ग़ाफ़िर रिज़वी फ़लक छौलसी व मौलाना सैयद रज़ी ज़ैदी फंदेड़वी जिल्द-10 पेज-156 दानिशनामा ए इस्लाम इंटरनेशनल नूर माइक्रो फ़िल्म सेंटर, दिल्ली, 2024 ईस्वी।

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